पटेल पत्र -

 


                ~पटेल पत्र~
गोरों ने जब घायल करके भारत का भूगोल दिया।
वीर प्रसूता वसुधा ने तब लौह पुरुष अनमोल दिया।
जिसने माँ को द्रवित देख हो संकल्पित प्रण ठाना था।
बिखरे माला के मोती सब एक सूत्र में लाना था।
चिंतन करके पत्र लिखा घर रजवाड़ों के छोड़ा था।
वह पत्र नहीं ऐसा लगता की अश्वमेध का घोड़ा था।
जैसे जैसे हर रजवाड़ा चिट्ठी खोल रहा था।
अक्षर अक्षर लौहपुरुष का पौरुष बोल रहा था।
विलय पत्र पर हस्ताक्षर कर अपनी लाज बचा लो।
वर्ना दुष्परिणाम झेलने का मन्तव्य बनालो।
सोचो जिस दिन भारत में ही पाँच सौ बासठ देश बनेगें।
कितनी सीमाएं होगीं और कितने यहाँ नरेश बनेगें।
तमिल नाडु से जम्मू की यात्रा आसान नहीं होगी।
किस देश के वासी हो इसकी पहचान नहीं होगी।
और अयोध्या से चल कर जब सेतु समुद्रम जाओगे।
तब बोलो कितने देशों से तुम वीजा बनवाओगे।
आज नही यदि जागे आगे भागों में भी भाग बटेंगे।
जैसे पाक बटा है वैसे विस्मिल व अश्फाक बटेगें।
पवित्र गौतमी व गंगा का बहता पवन नीर बटेगा।
प्राणों से भी प्यारा हमको कच्क्ष और कश्मीर बटेगा।
पुरखों की जागीर बटेगी भारत की तश्वीर बटेगी।
धरती पर आने वाले हर बच्चे की तक़दीर बटेगी।
अगर एक न हो पाये तो ख्वाजा बुद्ध व राम बटेगें।
बारह ज्योतिर्लिंग बटेंगे और ये चारों धाम बटेंगे।
तो कुछ लोगों को पत्र नही यह शांति दूत सन्देश लगा।
कुछ लोगों को कर्म युक्त यह गीता का उपदेश लगा।
कुछ रजवाड़े सहमत होकर राष्ट्र एकता दिखलाये।
कुछ हठधर्मी विलय पत्र का फिर विरोध करने आये
बोले तब वल्लभ जी सबको भारत का सम्बल देगें।
लेकिन जो विद्रोह करेगें सैनिक उन्हें कुचल देगें।
जिसके मन में लहरायेगी राष्ट्र प्रेम की गंगा।
उनका कवच और कुंडल फिर होगा सदा तिरंगा।
कुछ रजवाड़े खुश थे तो कुछ दुःखी दिखाई देते थे।
बहुतों को पटेल जी ज्वाला मुखी दिखाई देते थे।
कुछ को तो सिंहासन ही श्मशान दिखाई देते थे।
कुछ को लंका फूँक रहे हनुमान दिखाई देते थे।
सब समझ गए अब भारत में शीघ्र विलय करना होगा।
किंचित किया विलम्ब अगर तो निश्चित ही मरना होगा।
बस धीरे धीरे पाँच सौ अट्ठावन हस्ताक्षर हो पाये ।
शेष चार पर तब वल्लभ विकराल घटा बन कर छाये।
पहले कूट नीति के बलपर जूनागढ़ को एक किया।
सोमनाथ में जाकरके फिर मन्दिर का अभिषेक किया।
साम दाम व दंड भेद की माला मन में फेर लिया।
और हैदराबाद में जाकर के निजाम को घेर लिया।
उसके घमण्ड को जरासंध सा दो टुकड़ो में फाड़ दिया।
और दुर्ग की चोटी पर सेना ने झण्डा गाड़ दिया।
लोकतंत्र के महा गठन का सञ्चालन बेजोड़ किया।
मैसूर कच्क्ष भोपाल हैदराबाद सभी को जोड़ लिया।
जम्मू व कश्मीर की लेकिन एक रियासत शेष रही।
नेहरू की हठधर्मी के कारण यह सदा विशेष रही।
वरद हस्त यदि बापू का नेहरू पर भरपूर नहीं होता।
तो भारत माता के मस्तक पर यह नासूर नहीं होता।

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