सीधी उंगली से कभी घी निकलता नहीं है - कवि शिव कुमार व्यास
कवि शिव कुमार व्यास
अपनी पुरानी है परम्परा सदा से यही,
पहले तो शत्रु को भी प्यार से मनाते हैं।
किन्तु जब झूठे दम्भ से वो बाज आता नहीं,
तब उसे सत्यता का आइना दिखाते हैं।
धर्म पंथ का सदैव ही किया अनुसरण,
कभी भी नहीं अधर्म पथ अपनाते हैं।
युद्ध जब दिखता समक्ष हो अवश्यमेव,
तब भी प्रथम सन्धि पत्र भिजवाते हैं।।
मूर्ख के समक्ष ज्ञान दुष्ट के समक्ष ध्यान,
खल कामियों को कभी प्रेम नही भाया है
प्रभु ने भी तीन दिन खटकाया द्वार किन्तु
सागर की ओर से जवाब नही आया है।
क्योकि भय बिन प्रीति सम्भव ही होती नही,
इसी लिये राम जी ने धनुष उठाया है।
काम क्रोध लोभ से विरक्त हैं प्रभु परन्तु,
सागर की दुष्टता पे क्रोध चढ़ आया है।
क्रोध आया राम को तो बोले वे लखन से कि,
सागर की भ्रांतियों को भंग कर दूँगा मैं।
जिस जल राशि पे घमंड करता है यह
उसको सुखा के उसे दंग कर दूँगा मैं।
देखेगा समस्त विश्व राम का प्रताप अब
अंग भंग संग में अपंग कर दूँगा मैं।
सारी रंग बाजी एक क्षण में भुला के इसे,
चेहरे का रंग, बदरंग कर दूंगा मैं ॥
घोर विकराल शब्द कान पे पड़े तो मानो
सागर का सारा मिथ्या शौर्य डोलने लगा।
जीव जन्तु जलनिधि के हैंअकुलाये मानो,
अग्नि वाण सागर में विष घोलने लगा।
अतल वितल थर थर कांपने लगे व
जल जल कर जल शक्ति तोलने लगा।
कंचन की थाल में सजाके पन्ना पुखराज,
सिन्धु त्राहि माम त्राहि माम बोलने लगा।
सीधी उंगली से कभी घी निकलता नहीं है,
दुष्ट नहीं मानता है, हाथ चाहे जोड़िये।
सांप को पिलाओ दूध रात दिन पूजा करो,
डसना न छोड़ता है भले प्राण छोड़िए
ऐसे ही पड़ोसी पाक चीन फुफकारते हैं,
इस ओर ही मिसाइलों का मुख मोड़िये।
दांत दिखलाने से न कुछ हल होगा बस,
दुष्ट आतताइयों के विषदन्त तोड़िये।

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