लिपट तिरंगे में शरहद से – शिव कुमार ‘व्यास’

 

लिपट तिरंगे में शरहद से – शिव कुमार ‘व्यास’


                                                                                                                           ( विकास बनाम शहीद )


लिपट तिरंगे में सरहद से बेटे जब घर आते हैं।
तब कविता के अक्षर अक्षर में शोले भर जाते हैं।

जब की उनको संगीनों का बोल बदलना आता है।
अपने दुश्मन का सारा भूगोल बदलना आता है।
हाथ खोल दो सैनिक के तो शक्ति भैरवी जागेगी।
न तो बांस बचेगा कोई ना ही बाँसुरी बाजेगी।

नागफनी के बागों में अब फूल खिलाना बंद करो।
आस्तीन के नागों को अब दूध पिलाना बंद करो।
दुश्मन के खुनी हाथों से हाथ मिलाना बंद करो।
मनमोहन की भाषा में गीता समझाना बंद करो।

भैंस के आगे बीन बजाना बंद करो दिल्ली वालों।
सरहद पर अब शीश कटाना बंद करो दिल्ली वालों।
बंद करो अब झूठी मूठी इस विकास की गंगा को।
सबसे पहले करो सुरक्षित सरहद और तिरंगा को।

भारत माँ के जिन बेटों ने हंसकर खाई गोली है।
उनके बच्चे भूल गए कि होती कैसी होली है।
रंग अबीर गुलाल व गुझिया पापड़ तक सर्मिंदा हैं।
वैरी के नापाक इरादे यहाँ पे जब तक जिन्दा हैं।

उस बाप के दिल पर सोंचो कैसी बिपदा आयी है।
जिसने अपने हांथो से बेटे की चिता सजाई है।
हर शहीद की विधवा के जो अन्तस् की अभिलाषा है।
उसकी अभिलाषा ही मेरी कविता की परिभाषा है
सेना को स्वच्छंद बनाओ और इरादे शुद्ध करो।
इस नापाक पड़ोसी से अब आर पार का युद्ध करो।

बिजली सड़क सुरक्षा होना निश्चित बहुत जरुरी है।
लेकिन पहले उसको देखो जो अपनी कमजोरी है।
फिर विकास की धारा को सागर का ज्वार बना लेना।
बुलेट ट्रेन के साथ बैटरी वाली कार बना लेना।
और विकास के हों जितने वे सारे हथियार चुनो।
लेकिन पहले घाटी से ये आती करुण पुकार सुनो।

जिस माटी के मार्ग पटे रहते थे सदा प्रसून से।
उस घाटी के पथ को कायर लाल कर रहे खून से।
अमरनाथ की सीढ़ी का हर पत्थर आज कराह रहा।
लहू से लतपथ जर्रा जर्रा यही आप से चाह रहा।
आतंकी संगठनो पर अब सीधे बढ़कर घात करो।
जिस भाषा में समझे दुश्मन उस भाषा में बात करो।

वर्ना बार बार की माफ़ी दुर्बलता बन जाती है।
आगे चलकर इतिहासों में कायरता कहलाती है।

                            शिव कुमार ‘व्यास’
                                        बाराबंकी

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